इश्क़ भी जूनून भी

क्यों न सज़ा मिलती हमें मोहब्बत में?

आख़िर हमने भी तो बहुत दिल तोड़े थे उस शख्स की ख़ातिर।

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है इश्क़ भी जूनून भी,

मस्ती भी जोश-ए-खून भी;

कहीं दिल में दर्द,

कहीं आह सर्द, 

कहीं रंग ज़र्द;

है यूँ भी और यूँ भी।

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लोग तो बेवजह ही खरीदते हैं आईने,
आँख बंद करके भी अपनी हकीकत जानी जा सकती है।

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